भारतीय टेस्ट टीम में नए गेंदबाजों के लिए मौका या सिर्फ अस्थायी जगह

सारांश जैन की एंट्री ने फिर उठाया चयन पर सवाल

भारतीय टेस्ट टीम में जगह पाने के लिए सिर्फ अच्छा प्रदर्शन काफी है या सही समय पर किसी सीनियर खिलाड़ी की चोट भी उतनी ही जरूरी हो गई है। पिछले दो साल के चयन को देखें तो यह सवाल अब और गंभीर लगता है।

श्रीलंका दौरे के लिए 33 साल के ऑफ स्पिनर सारांश जैन को भारतीय टेस्ट टीम में शामिल किया गया है। घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें यह मौका तब मिला, जब वॉशिंगटन सुंदर हैमस्ट्रिंग चोट के कारण बाहर हो गए।

मुद्दा यह नहीं है कि सारांश इस मौके के हकदार थे या नहीं। असली सवाल यह है कि अगर सुंदर फिट रहते, तो क्या सारांश का नाम टीम में आता। यही सवाल पिछले कुछ समय में कई गेंदबाजों के करियर पर लागू होता दिख रहा है।

भारतीय टेस्ट टीम में नए गेंदबाजों को शामिल तो किया जा रहा है, लेकिन कई मामलों में वे लंबी योजना का हिस्सा कम और चोटिल खिलाड़ियों के विकल्प ज्यादा नजर आते हैं। यही पैटर्न अब एक नए ट्रेंड की तरह सामने आ रहा है।

खाली जगह बनी तो नए नामों को मिला मौका

बीते दो साल में कई गेंदबाज भारतीय टेस्ट टीम के आसपास आए, कुछ को डेब्यू मिला और कुछ सिर्फ स्क्वॉड तक सीमित रह गए। लेकिन इनमें से ज्यादातर को लगातार मौके नहीं मिले।

हर्ष दुबे को अफगानिस्तान टेस्ट के लिए टीम में बुलाया गया था, लेकिन उन्हें डेब्यू का मौका नहीं मिला। जैसे ही रवींद्र जडेजा फिट हुए, हर्ष का नाम टीम से बाहर हो गया।

मुकेश कुमार को मौका उस समय मिला, जब शार्दुल ठाकुर पूरी तरह फिट नहीं थे। उन्होंने कुछ टेस्ट खेले, लेकिन बाद में बाहर हो गए और फिर टेस्ट टीम में स्थायी वापसी नहीं कर सके।

अंशुल कंबोज इंग्लैंड में चोटिल खिलाड़ियों के विकल्प के रूप में टीम में आए। उन्होंने एक टेस्ट खेला, लेकिन इसके बाद चयनकर्ताओं की योजना में उनकी जगह साफ नजर नहीं आई।

इससे यह धारणा बनती है कि कई गेंदबाजों की किस्मत उनके अपने प्रदर्शन से पहले किसी दूसरे खिलाड़ी की फिटनेस पर निर्भर हो रही है। टीम में जगह मिलती है, लेकिन भरोसा और समय दोनों सीमित रहते हैं।

भारत विकल्प तैयार कर रहा है या सिर्फ बैकअप खोज रहा है

किसी भी बड़ी टेस्ट टीम को भविष्य के लिए गेंदबाज तैयार करने पड़ते हैं। खासकर भारत जैसी टीम के लिए यह और जरूरी है, क्योंकि लंबे सीजन, विदेश दौरे और वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप जैसे दबाव लगातार बने रहते हैं।

लेकिन समस्या यह है कि कई गेंदबाज उत्तराधिकारी की तरह तैयार होते नहीं दिखते। वे अधिकतर स्टैंडबाय विकल्प की भूमिका में रह जाते हैं।

आकाश दीप इसका बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने 10 टेस्ट में 28 विकेट लिए और इंग्लैंड में मैच जिताने वाला प्रदर्शन भी किया। इसके बावजूद उन्हें लंबे समय तक लगातार मौके नहीं मिले।

हर्षित राणा सीमित ओवरों के प्रारूप में भारतीय टीम की पसंद बनते दिखे, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में दो मैचों के बाद उनका रास्ता कठिन हो गया। अगर कोई गेंदबाज अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी टीम में अपनी जगह सुरक्षित नहीं कर पा रहा, तो सवाल सिर्फ खिलाड़ी पर नहीं, चयन की सोच पर भी उठता है।

गेंदबाजों को अक्सर कम समय में खुद को साबित करना पड़ता है। एक मैच खराब गया या कोई सीनियर वापस आ गया, तो उनका नाम तुरंत पीछे चला जाता है। यह तरीका भविष्य की टेस्ट गेंदबाजी इकाई बनाने में बाधा बन सकता है।

बल्लेबाजों को मिलता है ज्यादा भरोसा

चयन नीति में एक और फर्क साफ दिखता है। बल्लेबाजों को आम तौर पर गेंदबाजों से ज्यादा समय और भरोसा मिलता है।

बी साई सुदर्शन शुरुआत में सफल नहीं हुए, फिर भी उन्हें दोबारा मौका दिया गया। करुण नायर को भी लंबा रन मिला। इसका मतलब है कि बल्लेबाजों को यह भरोसा दिया जाता है कि एक या दो खराब मैचों से उनका करियर खत्म नहीं माना जाएगा।

गेंदबाजों के साथ तस्वीर अलग दिखती है। उन्हें टीम में जगह मिलती है, लेकिन कई बार यह जगह स्थायी अवसर में नहीं बदलती। उनके लिए गलती की गुंजाइश कम दिखाई देती है।

टेस्ट क्रिकेट में गेंदबाजों को लय, भूमिका और कप्तान का भरोसा चाहिए होता है। अगर हर सीरीज में उनका स्थान चोट और वापसी के हिसाब से बदलता रहेगा, तो वे लंबे समय की योजना में कैसे फिट होंगे, यह बड़ा सवाल है।

WTC के दबाव ने चयन को और सावधान बनाया

वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप ने हर टेस्ट मैच का महत्व बढ़ा दिया है। अब एक हार भी फाइनल की दौड़ पर असर डाल सकती है। इसी वजह से टीम प्रबंधन जोखिम कम लेना चाहता है और अनुभवी खिलाड़ियों पर भरोसा करता है।

यह सोच समझ में आती है, लेकिन इसका नुकसान भी है। अगर नए गेंदबाज सिर्फ तब खेलेंगे, जब कोई सीनियर चोटिल होगा, तो भविष्य की तेज गेंदबाजी और स्पिन इकाई कैसे तैयार होगी।

आज जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद सिराज और रवींद्र जडेजा भारतीय टेस्ट टीम की बड़ी ताकत हैं। लेकिन आने वाले तीन चार साल में इन्हीं जगहों पर नए चेहरों की जरूरत पड़ेगी। तब वही गेंदबाज काम आएंगे, जिन्हें अभी सही समय और लगातार मौके मिलेंगे।

सिर्फ स्क्वॉड में नाम शामिल कर लेना तैयारी नहीं है। खिलाड़ी तभी तैयार होता है, जब उसे भूमिका, मैच अनुभव और असफल होने के बाद वापसी का भरोसा मिले।

सारांश जैन के सामने असली चुनौती टीम में टिकना है

सारांश जैन के लिए श्रीलंका दौरा बड़ा अवसर है। 33 साल की उम्र में उनके पास इंतजार करने के लिए बहुत लंबा समय नहीं है। अगर उन्हें डेब्यू मिलता है, तो उनके लिए विकेट लेना ही अकेली चुनौती नहीं होगी।

सबसे बड़ी चुनौती होगी अगली टीम में अपना नाम बनाए रखना। पिछले दो साल का संकेत यही है कि भारतीय टेस्ट टीम में डेब्यू मिलना पहले की तुलना में थोड़ा आसान हुआ है, लेकिन टीम में टिके रहना कहीं ज्यादा कठिन हो गया है।

सारांश की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है। यह भारतीय टेस्ट टीम की चयन नीति, भविष्य की योजना और नए गेंदबाजों को दिए जा रहे भरोसे से जुड़ा मामला है।

अगर भारत सच में अगली पीढ़ी की गेंदबाजी इकाई बनाना चाहता है, तो नए खिलाड़ियों को सिर्फ चोटिल सीनियरों की जगह भरने वाला विकल्प नहीं बनाना होगा। उन्हें समय, भूमिका और लगातार अवसर देने होंगे। वरना कई नाम आते रहेंगे, लेकिन स्थायी समाधान तैयार नहीं हो पाएगा।

लेखक के बारे में
क्रिकेट विशेषज्ञ

1987 में कोलकाता में पैदा हुए रोहन शर्मा ने 2012 में पुणे विश्वविद्यालय से स्पोर्ट्स सांख्यिकी में मास्टर्स की डिग्री पूरी की। 2013 से 2020 तक, उन्होंने भारतीय क्रिकेट बोर्ड के साथ सहयोग किया, खिलाड़ियों के एनालिटिक्स और खेल रणनीति के अनुकूलन पर ध्यान केंद्रित किया। शर्मा ने 16 शैक्षिक पेपर लिखे हैं, मुख्य रूप से गेंदबाजी तकनीकों के विकास और फ़ील्ड प्लेसमेंट के परिवर्तन का समर्थन किया। 2021 में, उन्होंने पत्रकारिता में परिवर्तन किया। शर्मा वर्तमान में क्रिकेट पर विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं, मैच गतिकी और खिलाड़ी रणनीतियों पर दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, नियमित रूप से विभिन्न खेल-केंद्रित प्लेटफ़ॉर्मों में योगदान करते हैं।

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